[dropcap size=small]T[/dropcap]hough the short story is in Hindi, it really hits home. Dedicated to all the farmers throughout the country, Crizic brings you a short story penned down by one of our writers.

गमछा

‘कहाँ से हो भैया?’ मैने उससे पूछा|

‘यहीं दौसा-बस्वा के पास|’ उसने सुपारी मुँह में डालते हुए कहा|

‘खेती बाड़ी है?’

‘हाँ| यहीं कुछ दस एकड़ ज़मीन| बस उसी के लिए आए हैंगे इधर|’ एक अजीब से राजस्थानी लहज़े में उसने कहा|

उमर कुछ 40 साल से ज़्यादा नही होगी उसकी, पर वो लग बड़ा रौबदार रहा था| घनी काली मूच्छेँ और सर पर शोभा बढ़ाती एक रंगीन पगड़ी के साथ वो सचमुच पक्का राजस्थानी ही लग रहा था| और तो और, उसका गमछा डालने का भी एक अलग ही ढंग था|

‘का लगता है? कुछ करेंगे ये लोग?’ मैने मंच की तरफ इशारा करते हुए कहा|

उसने घूर कर मेरी तरफ देखा|

‘हमें लगता नहीं करेंगे तो इहा तक थोड़े ही ना आते! सब चूतिया गये हैं इस देस के लोग ना! कुछ किया नहीं तो कहाँ से तीन बच्‍चों का पेट भरेंगे? पिछले साल बारिस सारी फसल खा गयी| ओले गिरे सो अलग| आँवले का भी इक ठो बाड़ा था, वो भी नहीं है अब|’

‘अगर समस्या नहीं सुलझी इधर तो क्या करोगे?’

‘भैया, ई जो देस है ना? तुम्हें का लागत है कौन चलावे है? भीड़ के उस तरफ जो लोग हैं वो? झंडे उठाए खड़े वो? नारे लगाने वाले? ना| देस हम चलाए हैं| तुम चलाय हो| साहब लोग नाही|’

‘बातें तो बड़ी अच्छी करते हो| तुम काहे नहीं नेता बने?’ मैने मज़किये लहज़े में उससे कहा|

वो गंभीर हो गया| ‘कोसिस किए थे भैया! समाजवादी से टिकट मिला था तीन बार| हार गये और का| पैसे के बिना ना होता यह, ना होता वो|’

‘अभी तो बोल रहे थे देस हम चलाए हैं?’ मैने आँख मारते हुए उसे कहा|

परंतु वो गंभीर ही था|

‘देस ज़रूर हम चलाए हैं, पर दुनिया बाबू लोग चलाए हैं| बड़े लोग| हम बस नौकर हैं इस देस के, मालिक तो वो हैं|’

‘हम समझे नहीं|’

‘समझते तो मंच पर नही होते सामने?’

‘तो तुम मंच पर क्यों नहीं हो?’

‘क्योंकि अगर हम सच समझे हैं, तो सच माने भी हैं| सच यही है की हमार घर में तीन बच्चे हैं जो इक वकत की रोटी खाते हैं| बीवी है जिसे हम आज तक कुछ ना दिए| गाँव में कुछ राजपूत हैं जिनके उधार ना चुकाए और वो घर बेइज़्ज़ती करने आते रहत हैं| अब एक सूखा खेत है जो मात्र चलने के काम आता है| और आख़िर में ई शरीर है, जिसमे अब जितना दम है, वो इकहट्टा करके हम इधर आ गये| तुम बोले थे ना की समस्या नहीं सुलझी तो क्या करेंगे?’

मैने हाँ में सर हिलाया|

‘तो हम, तो हम —-‘ वो बोलते बोलते एकदम सोच में पड़ गया| फिर एक रहस्यमयी मुस्कान के साथ बोला, ‘तो हम इसे सुलझायेंगे!’

‘हम फिर नहीं समझे|’

‘हम बोले ना, समझते तो सामने मंच पर ना होते|’ उसने अपना गमछा ठीक करते हुए कहा और फिर मुस्कुराया|

नेताजी सामने भाषण दे रहे थे| मैं थोड़ा आगे बढ़ गया| पीछे मुड़कर देखा, तो वो नारे लगा रहा था| बड़ा खुश था वो| उसकी खुशी में पर एक अजीब सा खोखलापन था| खैर, मैने सोचा, सब यहाँ ऐसे ही हैं| खोखली दुनिया में| मैं नेताजी को सुनने लगा|

10 मिनिट हुए होंगे की अचानक पीछे से ज़ोर ज़ोर से आवाज़ें आना शुरू हो गयी|

‘उतारो! उतारो!’

मैं पलटा| देखा की सब लोग उस पेड़ के इर्द-गिर्द खड़े थे, जिससे टिक कर मैं इतनी देर खड़ा था| उपर टहनियों की तरफ देखा, तो कुछ लोग उसके शव को गमछे से अलग कर रहे थे|

हाँ, उसके|

इसके बाद क्या हुआ, मुझे ज़्यादा याद नहीं| याद है तो उसका मुरझाया निर्जीव चेहरा, जो भारत के हर एक किसान की कहानी बयान कर रहा था| याद है वो पगड़ी| याद है नेताजी का मंच पर अपना भाषण ज़ारी रखना, और उन्हें ऐसी ‘छोटी-मोटी’ बातों से फ़र्क ना पड़ना| याद है वो लोग, जो उसे रोक ना पाए|

और हाँ, एक और चीज़| मुझे याद है वो गमछा, जो उस पेड़ से लटका हुआ भारत के हालत बयान कर रहा था|

– R